
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय बढ़ाने की चुनौती: भारत के लिए एक गंभीर परीक्षा
स्वास्थ्य किसी भी राष्ट्र के मानव पूंजी निर्माण की बुनियाद है, फिर भी विश्व भर में — विशेषकर निम्न व मध्यम आय वाले देशों (LMICs) में — सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय लगातार दबाव में है। विश्व बैंक के हालिया आकलन बताते हैं कि इन देशों में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी न्यूनतम प्रति व्यक्ति सार्वजनिक व्यय का मात्र आधा हिस्सा ही वास्तव में खर्च हो पा रहा है। यह अंतर सिर्फ़ आँकड़ों का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा एक ढांचागत संकट है।
समस्या की जड़ें
कोविड-19 महामारी के दौरान 2021 में वैश्विक ‘स्वास्थ्य के लिए विकास सहायता’ (Development Assistance for Health – DAH) अपने चरम पर पहुँची थी, लेकिन उसके बाद से इसमें निरंतर गिरावट देखी जा रही है। यह गिरावट अकस्मात नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नीतिगत बदलाव का परिणाम है। अमेरिका ने 2025 में अपने विदेशी सहायता कार्यक्रम में 67% की भारी कटौती की, जबकि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने भी क्रमशः 39%, 35% और 12% की कटौती करते हुए इसी दिशा का अनुसरण किया।
इसके समानांतर, विकासशील देशों पर बढ़ता ऋण बोझ भी स्वास्थ्य व्यय के रास्ते में एक बड़ी बाधा बनकर उभरा है। 2024 में वैश्विक सार्वजनिक ऋण 102 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच गया, जिसमें अकेले विकासशील देशों की हिस्सेदारी 31 ट्रिलियन डॉलर रही। ऋण चुकौती की बढ़ती लागत ने कई सरकारों को स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों से ध्यान हटाकर राजकोषीय समेकन की ओर मोड़ दिया है।
भारत का विशिष्ट संदर्भ
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और भी बहुआयामी है। समस्या केवल आवंटन की मात्रा तक सीमित नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के उपयोग की गुणवत्ता से भी जुड़ी है। संसद की एक समिति ने पाया कि प्रमुख स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के लिए आवंटित राशि का 2024-25 में मात्र दो-तिहाई हिस्सा ही खर्च हो सका — यानी धन की कमी से ज़्यादा, धन के उपयोग की क्षमता (absorption capacity) एक बड़ी बाधा है।
दूसरी ओर, व्यय की दिशा भी चिंताजनक है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के अनुमान के अनुसार, भारत अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य राशि का एक-चौथाई से भी कम हिस्सा निवारक (preventive) देखभाल पर खर्च करता है। जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि रोग की रोकथाम, उपचार की तुलना में कहीं अधिक लागत-प्रभावी (cost-effective) रणनीति है, भारत की व्यय संरचना अब भी उपचारात्मक (curative) देखभाल की ओर झुकी हुई है।
तीन-स्तरीय सुधार की आवश्यकता
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को प्रभावी बनाने के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना ज़रूरी है:
- पूर्ण उपयोग (Absorption) — आवंटित राशि को समय पर और पूरी तरह खर्च करने की प्रशासनिक क्षमता विकसित करना, ताकि बजट और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच की खाई कम हो।
- सही प्राथमिकता (Allocation) — निवारक व प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय का अनुपात बढ़ाना, जिससे दीर्घकाल में रोग-भार और उपचार लागत दोनों घटें।
- शासन-सुधार (Governance) — उप-राष्ट्रीय (राज्य व ज़िला) स्तर पर वित्तीय प्रबंधन, निगरानी और जवाबदेही तंत्र को सुदृढ़ करना, क्योंकि स्वास्थ्य सेवा वितरण का अधिकांश दायित्व इसी स्तर पर निभाया जाता है।
निष्कर्ष:
वैश्विक विकास सहायता में आ रही गिरावट को देखते हुए भारत जैसे देशों के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वे बाहरी सहायता पर निर्भरता घटाकर अपने घरेलू संसाधनों के बेहतर व स्मार्ट उपयोग पर ध्यान केंद्रित करें। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं की सफलता अब केवल बजट आवंटन बढ़ाने से नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की गुणवत्ता, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता, और उप-राष्ट्रीय शासन सुधार से तय होगी। संक्षेप में, “कितना खर्च हुआ” से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि “कैसे और कहाँ खर्च हुआ” — और यही आने वाले वर्षों में भारत की सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की राह तय करेगा।
