बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध: ‘शील्ड बिल’ से सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती

डिजिटल युग में इंटरनेट बच्चों की शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। लेकिन यही डिजिटल दुनिया साइबर बुलिंग, अनुचित सामग्री, ऑनलाइन शोषण, निजता के उल्लंघन और सोशल मीडिया की लत जैसी चुनौतियाँ भी पैदा कर रही है। इसी संदर्भ में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने वाला ‘शील्ड बिल’ (Safeguarding Healthy Internet Environments for Little Digital-Natives Bill, 2025) चर्चा में आया है। यह भाजपा सांसद बैजयंत पांडा का निजी सदस्य विधेयक है और बच्चों के लिए सोशल मीडिया की न्यूनतम आयु को लेकर चल रही 13 बनाम 16 वर्ष की बहस को नई दिशा देता है।

विधेयक का मूल उद्देश्य बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के संभावित दुष्प्रभावों से सुरक्षित करना है। इसके अनुसार 13 वर्ष से कम आयु का बच्चा सत्यापित माता-पिता की सहमति के बिना सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर खाता नहीं बना सकेगा।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक इंटरमीडियरी को माता-पिता के लिए निगरानी डैशबोर्ड, गोपनीयता सेटिंग्स के प्रबंधन और स्क्रीन टाइम सीमित करने जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करानी होंगी। बच्चों से संबंधित हानिकारक सामग्री की शिकायत मिलने पर उसे 36 घंटे के भीतर तथा बाल यौन शोषण सामग्री के मामले में 24 घंटे के भीतर हटाने का प्रावधान प्रस्तावित है। प्रत्येक ऐप में ‘रिपोर्ट चाइल्ड हार्म’ बटन की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर मध्यस्थों के लिए कठोर दंड का भी प्रस्ताव है। इससे स्पष्ट है कि विधेयक केवल बच्चों की जिम्मेदारी तय करने के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी उत्तरदायी बनाना चाहता है।

प्रतिबंध की आवश्यकता क्यों ?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल निष्क्रिय संचार माध्यम नहीं रह गए हैं। उनके एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए सामग्री का चयन करते हैं। स्रोत के अनुसार, विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम लत को बढ़ावा दे सकते हैं और संकीर्ण अथवा चरम विचारों को पुष्ट कर सकते हैं।

बच्चों के मामले में यह चिंता अधिक गंभीर है क्योंकि कम उम्र में डिजिटल साक्षरता, आलोचनात्मक सोच और जोखिमों को समझने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती। इसलिए बाल-सुरक्षा को केवल परिवार की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं होगा; प्लेटफॉर्म और राज्य की भी जवाबदेही आवश्यक है।

फिर भी केवल आयु-आधारित प्रतिबंध को अंतिम समाधान मानना उचित नहीं होगा। इंटरनेट बच्चों के लिए शिक्षा, रचनात्मकता, सूचना और सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। अत्यधिक प्रतिबंध बच्चों को सुरक्षित तो कर सकता है, लेकिन उन्हें डिजिटल दुनिया से पूरी तरह अलग कर देना दीर्घकाल में व्यावहारिक नहीं होगा।

इसके अलावा आयु सत्यापन स्वयं निजता का प्रश्न पैदा करता है। यदि प्रत्येक प्लेटफॉर्म बच्चों की उम्र और पहचान सत्यापित करेगा, तो बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत डेटा के संग्रह का खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसलिए बाल सुरक्षा और डेटा गोपनीयता के बीच संतुलन बनाना कानून की सफलता की महत्वपूर्ण शर्त होगी।

वैश्विक अनुभव से सीख :-

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर विभिन्न देशों में अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए जा रहे हैं। स्रोत के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 से 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया है तथा कंपनियों पर भारी जुर्माने का प्रावधान रखा है। इसके विपरीत अमेरिका का COPPA मुख्यतः बच्चों के डेटा संग्रह और अभिभावकीय सहमति से संबंधित है, न कि सोशल मीडिया तक पहुंच पर पूर्ण प्रतिबंध से।

इस तुलना से स्पष्ट है कि भारत के सामने केवल ‘प्रतिबंध या स्वतंत्रता’ का विकल्प नहीं है। वह आयु-सीमा, अभिभावकीय नियंत्रण, प्लेटफॉर्म जवाबदेही, डिजिटल साक्षरता और डेटा संरक्षण को मिलाकर एक समग्र मॉडल विकसित कर सकता है।

भारत में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए निम्नलिखित बहु-स्तरीय दृष्टिकोण आवश्यक है—

    1. केवल आयु-आधारित प्रतिबंध के बजाय जोखिम-आधारित नियमन विकसित किया जाए।
    2. अभिभावकों को प्रभावी निगरानी उपकरण उपलब्ध कराने के साथ बच्चों की निजता का भी सम्मान किया जाए।
    3. स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोग को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
    4. बच्चों से संबंधित हानिकारक सामग्री की शिकायतों के त्वरित निपटारे के लिए मजबूत शिकायत-निवारण तंत्र बनाया जाए।
    5. नियमन बनाते समय बच्चों की अभिव्यक्ति, सूचना तक पहुंच और निजता जैसे अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए।
    6. प्लेटफॉर्मों को ‘सेफ्टी-बाय-डिजाइन’ अपनाने के लिए बाध्य किया जाए, जिसमें डिफॉल्ट रूप से बच्चों के लिए मजबूत गोपनीयता और सुरक्षा सेटिंग्स हों।

    स्रोत में भी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, IT नियम 2021, बाल अधिकार संरक्षण और वैश्विक बाल ऑनलाइन सुरक्षा नियमन के साथ इस मुद्दे को जोड़ने पर बल दिया गया है। साथ ही, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से संबंधित ठोस कानून बनाने के लिए रचनात्मक संसदीय चर्चा की आवश्यकता बताई गई है।

    निष्कर्ष

    ‘शील्ड बिल’ भारत में एक महत्वपूर्ण नीति-बहस को सामने लाता है—बच्चों को डिजिटल दुनिया से बचाना है या उन्हें सुरक्षित डिजिटल नागरिक बनाना है? सही उत्तर दोनों के बीच संतुलन में है। भारत को ऐसा नियामक ढांचा विकसित करना चाहिए जो बच्चों को हानिकारक सामग्री, ऑनलाइन शोषण और डिजिटल लत से बचाए, लेकिन साथ ही उनकी निजता, अभिव्यक्ति और इंटरनेट तक उचित पहुंच को भी संरक्षित करे। इसलिए लक्ष्य केवल ‘सोशल मीडिया प्रतिबंध’ नहीं, बल्कि ‘बाल-केंद्रित, सुरक्षित और जिम्मेदार डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र’ का निर्माण होना चाहिए। यही दृष्टिकोण भारत को डिजिटल अधिकारों और बाल सुरक्षा के बीच एक संतुलित मॉडल प्रदान कर सकता है।

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