1.5°C सीमा का टूटना ‘अपरिहार्य’: अब लक्ष्य नुकसान को सीमित करना

जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक प्रयासों के सामने अब एक नया और अधिक कठिन प्रश्न खड़ा हो गया है — क्या दुनिया 1.5°C की सीमा को बचा पाएगी, या अब प्राथमिकता इस सीमा के उल्लंघन से होने वाले नुकसान को सीमित करने की होनी चाहिए? 3 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में UNEP के आकलन के अनुसार, 2015 के पेरिस समझौते में निर्धारित 1.5°C तापमान सीमा का टूटना अब अपरिहार्य हो चुका है। इसके साथ ही UNEP ने पहली बार विस्तार से ‘Overshoot, Peak and Decline’ मार्ग पर जोर दिया है।

पेरिस समझौते का उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 2°C से काफी नीचे रखना तथा उसे 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करना है। 1.5°C केवल एक राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि जलवायु जोखिमों को अपेक्षाकृत कम रखने की महत्वपूर्ण सीमा है। लेकिन वर्तमान उत्सर्जन प्रवृत्तियों ने इस लक्ष्य को गंभीर चुनौती दी है। UNEP के अनुसार, यदि सभी देश अपनी मौजूदा राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं और नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरी तरह लागू भी कर दें, तब भी तापमान वृद्धि की चरम सीमा लगभग 1.8°C तक पहुंच सकती है।

नई रणनीति का अर्थ यह स्वीकार करना है कि तापमान कुछ समय के लिए 1.5°C से ऊपर जा सकता है, लेकिन उस अवधि और अधिकतम तापमान को न्यूनतम रखा जाए तथा बाद में तापमान को नीचे लाने का प्रयास किया जाए। इसे तीन चरणों में समझा जा सकता है —

Overshoot → Peak → Decline

इस दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है कि 1.5°C के ऊपर बिताया गया प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष जलवायु जोखिम को बढ़ाता है। इसलिए लक्ष्य केवल ‘नेट-जीरो’ प्राप्त करना नहीं, बल्कि peak को कम और overshoot की अवधि को छोटा करना भी होना चाहिए। UNEP के अनुसार, हर पांच वर्ष तक उच्च उत्सर्जन जारी रहने से संभावित तापमान peak में लगभग 0.1°C की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है और समान वृद्धि को उलटना अधिक कठिन होता है।

1.5°C और 1.8°C के बीच केवल 0.3°C का अंतर दिखाई देता है, लेकिन जलवायु प्रणाली में यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है। अधिक तापमान का अर्थ है—अधिक चरम मौसम, समुद्र-स्तर में वृद्धि, पारिस्थितिक तंत्रों पर दबाव और खाद्य सुरक्षा के लिए बढ़ते जोखिम। रिपोर्ट के अनुसार, 1.5°C से ऊपर प्रत्येक अतिरिक्त अवधि भारी पर्यावरणीय कीमत ला सकती है। इनमें समुद्र-स्तर में तेज वृद्धि और प्रवाल भित्तियों को होने वाला नुकसान प्रमुख हैं। 2050 तक वैश्विक खाद्य उत्पादन में 14% तक गिरावट का अनुमान भी चिंता बढ़ाता है।

जलवायु नीति में अब केवल कार्बन डाइऑक्साइड पर ध्यान पर्याप्त नहीं है। UNEP के आकलन में मीथेन को विशेष महत्व दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अब तक हुई तापमान वृद्धि में मीथेन लगभग 0.5°C के लिए जिम्मेदार रहा है। मीथेन का वायुमंडलीय जीवनकाल CO₂ की तुलना में छोटा होने के कारण इसके उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने से निकट भविष्य में तापमान वृद्धि की गति को धीमा करने में मदद मिल सकती है। इसलिए कृषि, पशुपालन, अपशिष्ट प्रबंधन तथा तेल-गैस क्षेत्र से मीथेन उत्सर्जन को कम करना जलवायु नीति का प्रमुख हिस्सा होना चाहिए।

भारत के सामने जलवायु कार्रवाई और विकास की दोहरी चुनौती है। एक ओर ऊर्जा की बढ़ती मांग, औद्योगिकीकरण और रोजगार की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन से कृषि, जल संसाधन, तटीय क्षेत्र और गरीब आबादी सबसे अधिक प्रभावित हो सकती है। इसलिए भारत के लिए रणनीति केवल उत्सर्जन घटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसमें—

  • नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार
  • ऊर्जा दक्षता
  • हरित हाइड्रोजन
  • इलेक्ट्रिक मोबिलिटी
  • जलवायु-स्मार्ट कृषि
  • मीथेन नियंत्रण
  • मैंग्रोव एवं आर्द्रभूमि संरक्षण
  • तथा जलवायु-अनुकूलन

को समान महत्व देना होगा।

विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए Climate Finance और Technology Transfer महत्वपूर्ण हैं। विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को देखते हुए वैश्विक जलवायु वित्त में पर्याप्तता, पूर्वानुमेयता और समानता सुनिश्चित करनी होगी।

UNEP का संदेश निराशा का नहीं बल्कि रणनीति बदलने का संकेत है। यदि 1.5°C सीमा का उल्लंघन अपरिहार्य हो रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि जलवायु कार्रवाई निरर्थक हो गई है। इसके विपरीत, प्रत्येक 0.1°C की अतिरिक्त वृद्धि को रोकना महत्वपूर्ण है। वैश्विक समुदाय को तीन प्राथमिकताओं पर काम करना चाहिए —

  1. जीवाश्म ईंधनों से स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज संक्रमण।
  2. CO₂ के साथ-साथ मीथेन जैसे अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों में तेजी से कमी।
  3. अनुकूलन, जलवायु वित्त और प्रकृति-आधारित समाधानों में निवेश।

1.5°C लक्ष्य के सामने आज की वास्तविकता कठिन है, लेकिन विकल्प अभी भी मौजूद हैं। अब जलवायु नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि दुनिया 1.5°C से नीचे रह पाई या नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि overshoot कितना कम रहा, peak कितना नीचे रखा गया और decline कितनी तेजी से संभव हुआ। इसलिए 1.5°C की सीमा का संभावित टूटना जलवायु कार्रवाई का अंत नहीं, बल्कि अधिक तेज, न्यायपूर्ण और व्यावहारिक कार्रवाई की शुरुआत होना चाहिए।

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