
भारत में तेजी से बढ़ती खनन गतिविधियाँ आर्थिक विकास, रोजगार और बुनियादी ढाँचे के लिए आवश्यक हैं। लेकिन इनका विस्तार यदि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों तक हो जाए तो जल, जैव-विविधता और स्थानीय आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के आसपास खनन को लेकर दिया गया स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है।
फरवरी 2024 के आसन वेटलैंड (उत्तराखंड) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उसके 10 किलोमीटर के दायरे में खनन शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति की आवश्यकता बताई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह सिद्धांत केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व पर भी लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण क्या है?
यह मामला हिमाचल प्रदेश सरकार के आवेदन के संदर्भ में सामने आया। राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि आसन रिजर्व केवल हिमाचल प्रदेश में स्थित नहीं है और वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के आसपास राष्ट्रीय उद्यानों या वन्यजीव अभयारण्यों की तरह कोई वैधानिक बफर जोन निर्धारित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि आसन मामले में निर्धारित सिद्धांत केवल उत्तराखंड के लिए नहीं था। समानता के आधार पर जहाँ भी वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व या संबंधित सामुदायिक रिजर्व हैं, वहाँ यह निर्देश लागू होगा।
साथ ही अदालत ने नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) की स्थायी समिति अथवा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को यह निर्धारित करने का निर्देश दिया कि आसन वेटलैंड का विस्तार हिमाचल प्रदेश तक है या नहीं।
वेटलैंड संरक्षण क्यों महत्वपूर्ण है?
वेटलैंड केवल जल से भरे क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि ये अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र हैं। वे—
- भूजल पुनर्भरण में सहायता करते हैं;
- बाढ़ के प्रभाव को कम करते हैं;
- जल की गुणवत्ता बनाए रखने में योगदान देते हैं;
- मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों के लिए आवास प्रदान करते हैं;
- प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आश्रय स्थल हैं;
- स्थानीय समुदायों की आजीविका का आधार बन सकते हैं।
आसन वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व, आसन और यमुना नदियों के संगम पर स्थित है और प्रवासी जलपक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास होने के कारण 2020 में रामसर स्थल घोषित किया गया था।
इसलिए वेटलैंड के आसपास खनन को केवल भूमि उपयोग का प्रश्न मानना उचित नहीं होगा। खनन से जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, तलछट व्यवस्था और जैव-विविधता प्रभावित हो सकती है।
रामसर स्थल दर्जा vs घरेलू कानूनी संरक्षण :-
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है कि किसी वेटलैंड को रामसर स्थल का दर्जा मिलना अपने आप में भारतीय कानून के तहत कोई अलग वैधानिक संरक्षण व्यवस्था पैदा नहीं करता। हालांकि, यह उस वेटलैंड के अंतरराष्ट्रीय पारिस्थितिक महत्व की मान्यता है और भारत को घरेलू पर्यावरण कानूनों के माध्यम से उसकी पारिस्थितिक प्रकृति बनाए रखने की प्रतिबद्धता से जोड़ता है। इससे स्पष्ट हैं कि अंतरराष्ट्रीय दायित्व और घरेलू कानून हमेशा समान नहीं होते। संरक्षण का वास्तविक क्रियान्वयन भारतीय कानूनों, नियामक संस्थाओं और न्यायिक आदेशों के माध्यम से होता है।
वर्तमान नियामकीय चुनौती :-
वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 ने 2010 के नियमों का स्थान लिया। 2017 के नियमों में वेटलैंड के भीतर प्रतिबंधित गतिविधियों की स्पष्ट सूची को हटाकर पहचान और नियमन की जिम्मेदारी काफी हद तक राज्य वेटलैंड प्राधिकरणों को दी गई। इन नियमों की संवैधानिक वैधता भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के अधीन है।
यही स्थिति वेटलैंड संरक्षण में एक संभावित नियामकीय कमजोरी पैदा करती है—जबकि पारिस्थितिकी तंत्र की सीमाएँ प्रशासनिक सीमाओं से अलग हो सकती हैं।
इसके विपरीत राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास खनन पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अधिक स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध मौजूद हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का महत्व :-
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष समान पर्यावरणीय सुरक्षा का सिद्धांत है। यदि किसी एक वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के लिए पारिस्थितिक कारणों से सुरक्षा आवश्यक है, तो समान परिस्थितियों वाले अन्य रिजर्व को केवल प्रशासनिक सीमा के आधार पर कम सुरक्षा नहीं दी जा सकती।
यह दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार, पर्यावरण संरक्षण संबंधी न्यायिक दृष्टिकोण तथा सतत विकास की अवधारणा से जोड़ा जा सकता है।
यह न्यायपालिका की उस भूमिका को भी रेखांकित करता है जिसमें वह पर्यावरणीय कानूनों में मौजूद नियामकीय अंतराल को भरने के लिए सावधानी और समानता के सिद्धांतों का उपयोग करती है।
इसकी चुनौतियाँ क्या हैं ?
हालाँकि पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है, लेकिन प्रत्येक वेटलैंड के आसपास एक समान 10 किलोमीटर प्रतिबंध लागू करने से कुछ व्यावहारिक प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं—
- अलग-अलग वेटलैंड की पारिस्थितिक संवेदनशीलता अलग होती है। इसलिए वैज्ञानिक आधार पर क्षेत्र-विशिष्ट प्रबंधन अधिक प्रभावी हो सकता है।
- खनन कई राज्यों में रोजगार और राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है। अचानक प्रतिबंध लगाने के बजाय वैकल्पिक आजीविका और क्षेत्रीय विकास की रणनीति आवश्यक होगी।
- विभिन्न राज्यों में वेटलैंड की पहचान, सीमांकन और निगरानी की क्षमता समान नहीं है।
- यदि किसी वेटलैंड का पारिस्थितिक प्रभाव उसकी प्रशासनिक सीमा से बाहर तक फैला है, तो केवल राज्य-आधारित प्रबंधन पर्याप्त नहीं होगा।
आगे की राह :-
भारत को वेटलैंड संरक्षण के लिए वैज्ञानिक, सहभागी और क्षेत्र-विशिष्ट मॉडल अपनाना चाहिए।
- प्रत्येक महत्वपूर्ण वेटलैंड का वैज्ञानिक सीमांकन और कैचमेंट-टू-वेटलैंड आधार पर प्रबंधन किया जाए।
- खनन परियोजनाओं के लिए केवल दूरी आधारित मानक के बजाय संचयी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को महत्व दिया जाए।
- राज्य वेटलैंड प्राधिकरणों की तकनीकी एवं संस्थागत क्षमता बढ़ाई जाए।
- स्थानीय समुदायों को संरक्षण एवं निगरानी में सहभागी बनाया जाए।
- रामसर स्थलों के लिए स्पष्ट प्रबंधन योजनाएँ और नियमित पारिस्थितिकी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
- खनन, पर्यावरण और जल संसाधन विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।
- विकास परियोजनाओं में एहतियाती सिद्धांत, प्रदूषण फैलाने वाले द्वारा भुगतान का सिद्धांत और सतत विकास को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
निष्कर्ष :-
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण केवल खनन गतिविधियों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह भारत में पर्यावरणीय शासन के एक व्यापक प्रश्न को सामने लाता है—क्या आर्थिक विकास पारिस्थितिक सीमाओं की कीमत पर हो सकता है? वेटलैंड बाढ़ नियंत्रण, जल सुरक्षा, जैव-विविधता और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए उनका संरक्षण विकास-विरोधी कदम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक और पारिस्थितिक सुरक्षा की शर्त है।आगे की नीति का लक्ष्य खनन को पूर्णतः रोकना नहीं, बल्कि “जहाँ पारिस्थितिकी अनुमति दे, वहीं जिम्मेदार विकास” होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक कदम है।
